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राजिम: छत्तीसगढ़ का प्रयाग

छत्तीसगढ़ सरकार ने राजिम को उज्जैन तथा वारणशी की तर्ज पर विकसित करने की योजना बनाई है साथ राजिम में स्थित पंचकोशी यात्रा के मंदिरों तथा अन्य मंदिरों का उन्नयन कर उन्हें पर्यटन सर्किट का रुप दिया जायेगा।

by Ravikant Dewangan
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राजिम: छत्तीसगढ़ का प्रयाग

छत्तीसगढ़ में नई सरकार ने राजिम कुम्भ मेला पुनः प्रारम्भ करने की घोषणा की है। पूर्व में राजिम में होने वाले माघी मेला को राजिम कुम्भ मेला कहा जाता था। पूर्ववर्ती सरकार ने इसका नाम बदलकर माघी पुन्नी मेला कर दिया था। गौरतलब है की हाल में कैबिनेट की बैठक के बाद छत्तीसगढ़ सरकार ने राजिम कुम्भ मेले को भव्य तरीके से मानाने की घोषणा की है।साथ ही राजिम मंदिर के चारों ओर परिक्रमा पथ बनाने की भी बात कही गयी है। राजिम को उज्जैन और वाराणसी की तर्ज पर विकसित किया जायेगा। जिससे छत्तीसगढ़ के पर्यटन को देश विदेश में पहचान मिले।


राजिम नगर की ऐतिहासिकता :

राजिम छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में स्थित एक प्राचीन नगर है। इस स्थान का प्राचीन नाम कमलक्षेत्र है। ऐसी मान्यता है कि सृष्टि के आरम्भ में भगवान विष्णु के नाभि से निकला कमल यहीं पर स्थित था और ब्रह्मा जी ने यहीं से सृष्टि की रचना की थी। इसीलिये इसका नाम कमलक्षेत्र पड़ा।
इस प्राचीन नगरी का नाम राजिम क्यों पड़ा, इस संबंध में कहा जाता है कि राजिम नामक तेलिन महिला को भगवान विष्णु की आधी मूर्ति मिली, दुर्ग नरेश रत्नपुर सामंत वीरवल जगतपाल को स्वप्न हुआ, तब एक विशाल मंदिर बनवाया। तेलिन ने नरेश को इस शर्त के साथ मूर्ति दिया कि भगवान के साथ उनका भी नाम जुड़ना चाहिए। इसी कारण इस मंदिर का नाम राजिमलोचन पड़ा, जो बाद में राजीव लोचन कहलाने लगा।


राजिम में प्राप्त शिलालेख से ज्ञात होता है की प्राचीनकाल में यहाँ नल वंश का शासन था। नल वंश के प्रतापी शासक “विलासतुंग “ने राजिम के प्रसिद्द “राजीव लोचन मंदिर” का निर्माण कराया था। विलासतुंग का शासनकाल ६६०-७०० ई. के मध्य माना जाता है ,अतः इसी कालखंड में राजिम नगर की स्थापना हुई तथा मंदिर का निर्माण करवाया गया। राजिम के शिलालेख से राजिम नगर की प्राचीनता का प्रमाण मिलता है। विलासतुंग भगवान विष्णु का उपासक था। वह पाण्डुवंशीय शासक “महाशिवगुप्त बालार्जुन” का समकालीन था। पाण्डुवंशीय शासक महाशिवगुप्त बालार्जुन के शासनकाल को “प्राचीन छत्तीसगढ़ का स्वर्ण युग” कहा जाता है,क्योंकि यह काल धर्म ,स्थापत्य कला एवं सांस्कृतिक विकास के चरमोत्कर्ष का काल रहा।

कैसे पहुंचे राजिम :


१.हवाई जहाज के द्वारा -निकटतम हवाई अड्डा रायपुर का स्वामी विवेकानंद हवाई अड्डा है जिसकी दूरी लगभग ४३ किलोमीटर है। हवाई अड्डे से निजी वहां के द्वारा यहाँ पहुंचा जा सकता है।
२.रेल द्वारा – निकटतम रेलवे स्टेशन रायपुर है जिसकी दूरी लगभग ५० किलोमीटर है।
३.सड़क मार्ग द्वारा -रायपुर से सड़क मार्ग की दूरी लगभग ५० किलोमीटर है। रायपुर के बस स्टैंड से राजिम के लिए नियमित बसें उपलब्ध हैं

छत्तीसगढ़ का प्रयाग :राजिम (Lok Prayag Rajim)

राजिम नगर महानदी ,पैरी तथा सोंढुर नदी के त्रिवेणी संगम पर स्थित होने के कारण छत्तीसगढ़ का प्रयाग कहलाता है। इसे तीर्थ की संज्ञा दी गई है।आम लोगों की आस्था के कारण प्रयाग की तरह संगम में अस्थि विसर्जन तथा पिंडदान, श्राद्ध एवं तर्पण किया जाता है।राजिम अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और खूबसूरत प्राचीन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है।

 

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राजीव लोचन मंदिर – राजिम:

राजीव लोचन मंदिर, भगवान विष्णु को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण पंचायतन शैली में किया गया है। मंदिर का निर्माण नल वंशीय शासक विलासतुंग द्वारा करवाया गया था।राजीव लोचन मंदिर अपने स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्द है।मंदिर में प्राचीन भारतीय संस्कृति और शिल्प का अनूठा संगम है। स्थानीय मान्यता है की इस मंदिर का निर्माण भगवान विश्वकर्मा द्वारा किया गया था। राजिम, प्राचीन काल से छत्तीसगढ़ का एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्र रहा है इसलिए इसे छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक नगरी भी कहा जाता है।

राजीव लोचन मंदिर में दो शिलालेख भी है जिसमे रतनपुर के राजा रत्नदेव द्वितीय और जज्लय देव प्रथम के विजय आदि के विषय में वर्णन है। लेख संस्कृत भाषा एवं देवनागरी लिपि में है। इसका आरंभ ‘ओम नमो नारायणाय’ से हुआ है।

राजीवलोचन का यह प्रसिद्ध मंदिर चतुर्थाकार में बनाया गया है तथा उत्तर व दक्षिण दिशा में मंदिर के प्रवेश द्वार हैं। मंदिर का महामण्डप बारह खम्बो पर स्थित है तथा मंडप के बीचो-बीच गरुड़ देव की प्रतिमा हाथ जोड़े खड़ी है। मंदिर के गर्भगृह के दरवाजे के बाए-दाएं तथा उपर अनेक चित्र बने हुए है,जिनमे सर्प मानव व मिथुन की आकृति की मूर्तियां बनी हुई हैं। गर्भगृह में राजिवलोचन अर्थात् विष्णु का विग्रह सिंहासन पर स्थित है। यह प्रतिमा काले पत्थर की बनी विष्णु की चतुर्भुजी मूर्ति है। जिसके हाथों में शंक, चक्र, गदा और पदम है जिसकी लोचन के नाम से पूजा होती है। मंदिर के दोनों दिशाओं में परिक्रमा पथ और भण्डार गृह बना हुआ है।

आयताकार क्षेत्र के मध्य स्थित मंदिर के चारों कोण में श्री वराह अवतार, वामन अवतार, नृसिंह अवतार तथा बद्रीनाथ जी का धाम है। गर्भगृह में पालनकर्ता लक्ष्मीपति भगवान विष्णु की श्यामवर्णी चतुर्भुजी मूर्ति है जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म है। 12 खंबों से सुसज्जित महामंडप में श्रेष्ठ मूर्तिकला का उदाहरण प्रस्तुत किया गया है। आसन लगाकर बैठे भगवान श्री राजीवलोचन की प्रतिमा आदमकद मुद्रा में सुशोभित है। शिखर पर मुकुट, कर्ण में कुण्डल, गले में कौस्तुभ मणि के हार, हृदय पर भृगुलता के चिह्नांकित, देह में जनेऊ, बाजूबंद, कड़ा व कटि पर करधनी का सुअंकन है। राजीवलोचन का स्वरूप दिन में तीन बार बाल्यकाल, युवा व प्रौढ़ अवस्था में समयानुसार बदलता रहता है।

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इस मंदिर में सक्षात स्वयं भगवान विष्णु रात्रि को विश्राम करने आते हैं , जिसका प्रमाण मंदिर के अंदर पलंग पे बिछाई गई चादर में आई सिलवटे व तेल से भरी कटोरी का खाली मिलना है। इस मंदिर के पुजारी हर रोज रात्रि के समय मंदिर के दरवाजे में ताला लगाने से पहले मंदिर के अंदर भगवान विष्णु के विश्राम के लिए रखी गई पलंग के समाने एक कटोरे में तेल भर कर रख देते हैं। जब प्रातः काल मंदिर का दरवाज़ा खोला जाता है तो पलंग के सामने रखा कटोरा खाली मिलता है तथा पलंग के उपर बिछाई चादर सिकुड़ी व सिलवटे पड़ी हुई होती है जिसमे तेल के छोटे छोटे धब्बे दिखाई देते है,जैसे की किसी ने रात्रि के समय चमत्कारिक तरह से मंदिर के ताले लगे बंद दरवाजे से मंदिर में प्रवेश कर पलंग में लेटा हो तथा पलंग के पास पड़े तेल से अपनी मालिश करी हो।

यहाँ के पुजारी और लोगो का मानना है की स्वयं भगवान विष्णु यहाँ आते है तथा मालिश करते हैं , इसके बाद वे यही शयन करते है। मंदिर के गेट में हर रोज ताले लगाए जाते है परन्तु हर बार सुबह मंदिर में पलंग पर सलवटे देखने को मिलती है तथा तेल का भरा कटोरा खाली मिलता है.यहाँ पर भगवान विष्णु राजिव लोचन के नाम से जाने जाते है तथा उनके नाम पर ही इस तीर्थ का नाम राजीव लोचन पड़ा है। राजिम छत्तीसगढ़ का मुख्य मंदिर है। पुरी जगन्नाथ की यात्रा से लौटने वाले यात्री अक्सर राजिम लोचन मंदिर जाते हैं।मान्यता है की पूरी जगन्नाथ की यात्रा राजिम की यात्रा के बिना पूर्ण नहीं मानी जाती।

कुलेश्वर महादेव मंदिर – राजिम:

राजिम में संगम के मध्य में कुलेश्वर महादेव का एक विशाल मंदिर स्थित है जहाँ पर भगवान श्री राम ने वनवास के दौरान अपने कुल देवता की पूजा की थी।भगवान श्रीराम द्वारा संगम के मध्य में रेत से शिवलिंग का निर्माण किया गया था। कुलेश्वर महादेव मंदिर को राजीव लोचन मंदिर से जोड़ने के लिए लक्ष्मण झूला का निर्माण किया गया है जिससे अब सावन के समय कुलेश्वर महादेव के दर्शन करना भक्तों के लिए सुलभ हो जाता है।

 

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किवदंतियों के अनुसार प्राचीन राम मंदिर की बावली में माता सीता ने स्नान कर त्रिवेणी संगम में अपने हाथों से रेत का शिवलिंग बनाकर विधि विधान पूर्वक पूजा की ,जो की वर्तमान में कुलेश्वर महादेव के रूप में प्रसिद्द है। इस मंदिर के अंदर एक गुप्त गुफा मौजूद है, जो नजदीक ही स्थित लोमस ऋषि के आश्रम तक जाती है। यह स्मारक छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा संरक्षित है।

लोमस ऋषि आश्रम – राजिम:

लोमश ऋषि रामायण कालीन एक महान ऋषि मुनि थे। वनवास काल के दौरान श्रीराम ,माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ लोमश ऋषि के दर्शन करने राजिम आये थे। लोमश ऋषि ने ही श्रीराम को आगे के मार्ग के बारे में जानकारी दी थी तथा दंडकारण्य वन के बारे में बताया था। लोमश ऋषि के मार्गदर्शन में ही श्री राम एवं माता सीता ने अपने कुलदेवता की पूजा की थी। लोमश ऋषि का आश्रम संगम के निकट ही स्थित है। राजीव लोचन मंदिर से प्रारम्भ होने वाला लक्ष्मण झूला कुलेश्वर महादेव मंदिर के साथ ही लोमश ऋषि आश्रम को भी जोड़ता है।

पंचकोसी यात्रा – राजिम:

यह एक पैदल यात्रा होती है जो श्रद्धालुओं द्वारा राजीव लोचन मंदिर से प्रारम्भ की जाती है। यात्रा में कुल ५ पड़ाव होने के कारण इसे पंचकोसी यात्रा कहा जाता है। यह यात्रा प्रतिवर्ष कार्तिक -अगहन से पौष-माघ तक चलती है  यात्रा के पड़ाव हैं -पहला पड़ाव -पटेवा स्थित पटेश्वर महादेव ,दूसरा पड़ाव -चम्पारण स्थित चम्पकेश्वर महादेव ,तीसरा पड़ाव -बम्हनी स्थित ब्रम्हकेश्वरनाथ महादेव ,चौथा पड़ाव -फिंगेश्वर स्थित फणीकेश्वर महादेव ,पांचवां पड़ाव -कोपरा के कर्पुरेश्वर महादेव । त्रिवेणी संगम पर स्थित कुलेश्वर महादेव से यह यात्रा प्रारम्भ होकर यहीं पर समाप्त होती है।पंचकोशी यात्रा ५-७ दिन में समाप्त होती है। मान्यतानुसार जो लोग चार धाम की यात्रा नहीं कर पाते वह इस यात्रा में शामिल हो सकते हैं। यह यात्रा माघी पुन्नी मेला के पूर्व संपन्न हो जाती है।

राजिम कुम्भ मेला (Rajim Kumbh Mela):

राजिम में प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा को मेला का आयोजन किया जाता है ,जो महाशिवरात्रि तक चलता है। राज्य शासन द्वारा वर्ष २००१ से राजिम मेले को राजीव लोचन महोत्सव के रूप में मनाया जाता था। वर्ष २००५ से इसे कुम्भ के रूप में मनाया जाता रहा था। वर्ष २०१९ से राजिम माघी पुन्नी मेला के रूप में मनाया जा रहा था। वर्तमान में छत्तीसगढ़ सरकार ने इसे पुनः “राजिम कुम्भ मेला” के नाम से मनाने का निर्णय लिया है।मेला की शुरुआत कल्पवाश से होती है। पखवाड़े भर पहले से श्रद्धालु पंचकोसी यात्रा प्रारंभ कर देते हैं पंचकोसी यात्रा में श्रद्धालु पटेश्वर, फिंगेश्वर, ब्रम्हनेश्वर, कोपेश्वर तथा चम्पेश्वर नाथ के पैदल भ्रमण कर दर्शन करते है तथा धुनी रमाते हैं। १०१ किमी की यात्रा का समापन होता है और माघ पूर्णिमा से मेला का आगाज होता है। राजिम माघी पुन्नी मेला में विभिन्न जगहों से हजारो साधू संतो का आगमन होता है।राजिम माघी पुन्नी मेला का अंचल में अपना एक विशेष महत्व है।छत्तीसगढ़ के लाखों श्रद्धालु इस मेले को देखने दूर दूर से राजिम आते हैं।desh के vibhinn क्षेत्रों से साधु संतों का आगमन होता है तथा त्रिवेणी संगम में स्नान का पुण्य लाभ मिलता है।

राजिम को जिला बनाने की बरसों पुरानी मांग:

छत्तीसगढ़ के इस ऐतिहासिक नगरी को जिला बनाने की मांग पिछले कई वर्षों से की जा रही है। यह प्राचीन शहर अपने धार्मिक सांस्कृतिक विरासत के कारण देश विदेश में अपनी पहचान बना चुका है। नगर वासियों एवं क्षेत्र के लोगों की बरसों पुरानी मांग है की राजिम को जिला बनाकर इस नगर को उसका हक दिलाया जाये। इस हेतु पिछले ३० वर्षों से क्षेत्र के लोगों द्वारा सभी संभव प्रयास किये गए हैं परन्तु अभी तक शासन से कोई सकारात्मक पहल नहीं की गई है।
राजिम “छत्तीसगढ़ के गाँधी” कहे जाने वाले स्वतंत्रता सेनानी एवं बहुमुखी प्रतिभा के धनी पंडित सुंदरलाल शर्मा की जी की जन्म एवं कर्मस्थली रही है। वर्ष १९२५ में पंडित सुंदरलाल शर्मा जी ने दलितों को राजिम के मंदिर में प्रवेश दिलाकर छुआछूत की भावना को समाप्त करने का प्रयास किया था। स्वतंत्रता संग्राम के काल में भी राजिम एक महत्वपूर्ण केंद्र था। अतः इस प्राचीन शहर को जिला बनाकर उसका अधिकार दिया जाना चाहिए।

 

 

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